कोई नज़्म लिखो

Saurabh Jain

2016

नज़्म लिखो , बेशुमार लिखो
पर उससे बदलाव की उम्मीद मत रखो

तुम्हे लगेगा तुमने बड़ी बात कह दी है
तुमने ही अगली क्रांति की नीव रख दी है
बस तुम्हारी इस नज़्म से अंधकार जल जाएगा
और अगले ही दिन सब बदल जाएगा

ये बातें बेशक सच्ची नहीं है,
और ये ग़लतफ़हमी भी अच्छी नहीं है
तुम्हारी नज़्म किसी पर्वत पे मामूली चोट की तरह है
किसी विशाल लोकतंत्र के एक वोट की तरह है

तुमसे पहले भी सुख़नवरों ने बहुत कुछ लिखा है
पर किसी ने भी कोई बदलाव नहीं देखा है
तो नज़्म लिखो ,
पर उससे बदलाव की उम्मीद मत रखो

लिखो कि सूख गए हैं वो होंठ जिन्हे कुछ बोलना चाहिए था
कुछ परखना चाहिए था , कुछ टटोलना चाहिए था
लिखो कि तारीख़ के पन्ने बदल दिए जाते हैं
लोग अपने ही घर में छल लिए जाते हैं

लिखो कि चुप रहना अब एक मजबूरी है
पर सच का होना ही नहीं, दिखना भी ज़रूरी है

लिखो कि भूख से बिलखते लोगों का ये काम नहीं है
उनके ज़ख्मों पे वक़्त का आराम नहीं है
और ज़ीस्त है आराम जिनको, वो क्यूँकर लिखें
वो कड़वाहटें उनकी बातों में क्यूँकर दिखे

तुम्हे ही उड़ती तितलियों के रंग पकड़ने होंगे
तुम्हे ही कांपते होठों पे बोल रखने होंगे

तो जब तक ज़हन में सवाल है लिखो
जब तक स्याही में उबाल है लिखो

नज़्म लिखो,बेशुमार लिखो
पर उससे बदलाव की उम्मीद मत रखो

मुमकिन है कल कुछ लफ्ज़ तुम्हारी नज़्मों से जोड़े जाएंगे
कुछ पत्ते किसी और पेड़ से भी तोड़े जाएंगे
कुछ ज़ायका मिलेगा उस दौर की ज़रूरतों का
सब मिलाकर कुछ ख़याल निचोड़े जाएंगे

तब एक नज़्म बनेगी दीवार गिराने के लिए
तब एक ही नज़्म लगेगी बदलाव लाने के लिए

तो नज़्म लिखो , बेशुम्मार लिखो
पर उससे बदलाव की उम्मीद अभी मत रखो

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